ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 4 (2026)
हिन्दी के बाल उपन्यासों में बाल मनोविज्ञान का चित्रण
Authors
डॉ. डी जयभारती
Abstract
हिन्दी साहित्य में बाल मनोविज्ञान का अध्ययन बाल साहित्य की प्रकृति, प्रयोजन और रचनात्मक संरचना को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बालक केवल साहित्य का पाठक नहीं है; वह अपनी जिज्ञासा, कल्पना, संवेदना, भय, आकांक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक अनुभवों से निर्मित एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है। अतः बालक के लिए रचित साहित्य की सार्थकता इस बात से निर्धारित होती है कि वह बाल-चेतना के कितने निकट पहुँचता है। प्रस्तुत शोधालेख का केंद्रीय विषय ‘हिन्दी साहित्य में बाल मनोविज्ञान’ है और बाल उपन्यासों को इसके विशिष्ट अध्ययन-क्षेत्र के रूप में ग्रहण किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि हिन्दी बाल उपन्यासों तथा बाल-केंद्रित कथा-साहित्य में बालक के मानसिक संसार, भावनात्मक प्रतिक्रियाओं, सामाजिक संबंधों और व्यक्तित्व-विकास का किस प्रकार साहित्यिक रूपांतरण हुआ है। इसमें जिज्ञासा, कल्पना, भय, असुरक्षा, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता-बोध, मित्रता, पारिवारिक संबंध, नैतिक चेतना, सामाजिक यथार्थ तथा बदलते तकनीकी परिवेश जैसे आयामों का विश्लेषण किया गया है। शोधालेख का आधार गुणात्मक, विश्लेषणात्मक और व्याख्यात्मक दृष्टि है। उपलब्ध शोध-पत्रों के आलोक में यह प्रतिपादित किया गया है कि आधुनिक हिन्दी बाल साहित्य में बालक को केवल उपदेश ग्रहण करने वाले पात्र के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव करने, प्रश्न उठाने, निर्णय लेने और अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले सक्रिय अस्तित्व के रूप में देखने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। निष्कर्षतः बाल उपन्यास बाल मनोविज्ञान के महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज हैं, क्योंकि वे बालक के आंतरिक संसार और उसके सामाजिक परिवेश के अंतर्संबंधों को अभिव्यक्त करने की विशिष्ट क्षमता रखते हैं।
Download
Pages:1-4
How to cite this article:
डॉ. डी जयभारती "हिन्दी के बाल उपन्यासों में बाल मनोविज्ञान का चित्रण". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 4, 2026, Pages 1-4
Pdf, Certificate, Cover Page, Index Page, Editorial Page, Accept Letter
Please enter the email address corresponding to this article submission.

