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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
हरेला पर्वरू पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक पर्यावरण संरक्षण का समन्वय
Authors
डॉ. निधि उप्रेती
Abstract
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को जीवन का आधार, आध्यात्मिक चेतना का केंद्र तथा सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न अंग माना गया है। भारतीय लोकपर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा सामुदायिक उत्तरदायित्व के जीवंत उदाहरण भी हैं। उत्तराखण्ड का हरेला पर्व ऐसी ही समृद्ध लोकपरम्परा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें कृषि, जैव-विविधता, जल संरक्षण, वृक्षारोपण तथा पर्यावरणीय नैतिकता का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है।¹
समकालीन विश्व में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, जैव-विविधता के क्षरण तथा पर्यावरणीय असंतुलन जैसी समस्याएँ वैश्विक चिंता का विषय हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिपादित सतत विकास लक्ष्य भी स्थानीय ज्ञान प्रणालियों तथा सामुदायिक सहभागिता को पर्यावरण संरक्षण का आधार मानते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हरेला पर्व केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक व्यवहारिक एवं सतत जीवन-पद्धति के रूप में उभरता है।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य हरेला पर्व में निहित पारम्परिक ज्ञान प्रणाली का विश्लेषण करना तथा आधुनिक पर्यावरण संरक्षण के साथ उसके अंतर्सम्बन्धों का मूल्यांकन करना है। अध्ययन गुणात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध-पद्धति पर आधारित है तथा इसमें सांस्कृतिक अध्ययन, पर्यावरणीय शोध, सरकारी दस्तावेजों एवं समकालीन अकादमिक साहित्य का समन्वित अध्ययन किया गया है। शोध से यह स्पष्ट होता है कि हरेला पर्व भारतीय पारम्परिक पर्यावरणीय ज्ञान का प्रभावी उदाहरण है, जो वर्तमान पर्यावरणीय संकटों के समाधान हेतु महत्त्वपूर्ण प्रेरणा प्रदान करता है।

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Pages:27-29
How to cite this article:
डॉ. निधि उप्रेती "हरेला पर्वरू पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक पर्यावरण संरक्षण का समन्वय". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 27-29

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हरेला पर्वरू पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक पर्यावरण संरक्षण का समन्वय | International Journal of Research in Hindi