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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन श्रुत एवं अविश्रुत गाथाएँ
Authors
डॉ. श्यामता साहू
Abstract
राष्ट्रीय आन्दोलन के इस महान यज्ञ में सामान्य भारतीय जन-समुदाय भी अपना सर्वस्व बलिदान करते हुए संयुक्त होता चला गया था। वस्तुतः यह यथार्थ इतिहास है कि भारती की महान आजादी लाने में केवल कुछ बड़े राष्ट्रीय नेेताओं का ही योगदान नहीं रहा था, वरन् भारत की पवित्र भूमि के कण-कण से उपजे जन-जन के स्नेह और अनुराग का भी इसमें अद्भुत संगम था। इनके सक्रिय कार्यक्रमों और गतिविधियों ने ब्रिटानी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी और भारत में ब्रिटिश-साम्राज्य की इमारत में न भरी जा सकने वाली दरारें डाल दी थीं। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भारतीय महिलाओं ने भी डट कर भाग लिया था। महिलाओं ने अपने भविष्य की चिंता न कर अपना सर्वस्व समर्पण करते हुए ब्रिटिश प्रभुत्व के विरूद्ध सक्रिय आन्दोलनों में निरन्तर कार्य किया था। आधुनिक उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद की एक कर्मठ महिला द्रोपदी देवी ने भी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में तन-मन से भाग लिया था। आप कंाग्रेसी विचारधारा से तो ओत-प्रोत थीं ही कम्यूनिस्ट दर्शन को भी अपने अपनाया था। श्रमिकों के हितों की लड़ाई में भी द्रोपदी देवी अत्यधिक सक्रिय रही थी। द्रोपदी देवी को सक्रिय आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका अपनाने के लिये कई बार जेल भी जाना पड़ा, परन्तु जेल की यातनायें भी द्रोपदी देवी को अपने उद्देश्य से विचलित नहीं कर सकी थीं, इसके बाद तो इन्होने और अधिक सक्रियता से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेना शुरू कर दिया था। द्रोपदी देवी पर गांधीवाद का बहुत गहरा प्रभाव था, अतः ये धर्म और समाज सुधार के कार्यो में विशेष सक्रिय रही थी। वास्तव में ये सभी साधारण लोग आजादी के लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर रहे थे। ये फांसी के फंदे को वरमाला बनाकर और मौत को अपना जीवन साथी बना कर बलिदान कर रहे थे। स्पष्ट है कि नारा सबका एक था, मंजिल सभी की एक थी, कुर्बानी जिसके लिए हही वो चाहत एक थी। अनेकता में जिसके लिये एकतार्थी वह महानता आजादी की थी।
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Pages:38-40
How to cite this article:
डॉ. श्यामता साहू "भारतीय स्वाधीनता आंदोलन श्रुत एवं अविश्रुत गाथाएँ". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 38-40
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