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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
रामप्यारे रसिक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अध्ययन
Authors
डॉ. स्नेहलता निर्मलकर, नीलम सोनी
Abstract
बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में प्रेमचंद ने उपन्यास और कहानियों को सामाजिक यथार्थ से जोड़कर गद्य साहित्य को जनसरोकारों से संपृक्त किया। इसी काल में राष्ट्रीय चेतना भी साहित्य के केंद्र में आई। छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद जैसी काव्य धाराओं के साथ-साथ गद्य साहित्य ने भी निरंतर नए-नए प्रयोग किए और विषय-वस्तु की विविधता को आत्मसात किया। यही कारण है कि आधुनिक काल को प्रायः हिन्दी गद्य का काल कहा जाता है। इसी परंपरा में राम प्यारे रसिक जी का साहित्य विशेष महत्व रखता है। उनका जीवन साहित्य-साधना का जीवन था। उन्होंने सत्यम, शिवम, सुन्दरम् के आदर्श को अपने लेखन का आधार बनाया। उनकी काव्य-यात्रा विद्यार्थी जीवन से प्रारंभ हुई और जीवन के अंतिम क्षणों तक उन्होंने लेखनी का साथ नहीं छोड़ा।
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Pages:11-13
How to cite this article:
डॉ. स्नेहलता निर्मलकर, नीलम सोनी "रामप्यारे रसिक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अध्ययन". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 11-13
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