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VOL. 8, ISSUE 2 (2026)
प्रेमचंद और फकीरमोहन की कहानियों में सामाजिक यथार्थ और संवेदना
Authors
मौसम तिवारी
Abstract
साहित्यकार समाज के चितेरे होते हैं। शब्द इनकी कूँची है और साहित्य की विविध विधाएँ इनका चित्रपट। अपने समकालीन समाज और जीवन से सर्जना का रस खींचकर वे समाज की प्रतिमूर्ति को जीवंत करते हैं। भारतीय साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्रों में प्रेमचंद और फकीरमोहन सर्वाधिक प्रकाशवान माने जाते हैं। एक भारत की सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा के श्रेष्ठ कथाकार हैं तो दूसरे शास्त्रीय भाषा ओड़िआ के। ध्यातव्य है कि दोनों अपनी भाषाओं में कथा साहित्य के श्रेष्ठा माने जाते हैं। इनकी समय सीमा के बीच चार दशकों का अंतर है। परन्तु दोनों की सामाजिक दृष्टि सर्वाधिक समानता की परिचायिका है। निम्न-मध्यम-वर्गीय परिवार, भारत के ग्रामीण परिवेश की हवा-पानी और देश की पराधीनता का कटु अनुभव दोनों के जीवन के आधार रहे हैं। फलस्वरूप इन कथाकारों की कहानियों में सामाजिक न्याय की भावना, सामाजिक समता का संदेश, सामाजिक संवेदना की संस्थापना, मानव मूल्यों की गहरी पहचान, पारंपरिक शाश्वत तथा चिरंतन भारतीय जीवनदर्शन और सभ्यता, संस्कृति की महिमा का गान आदि कमोवेश समान रूप से द्रष्टव्य हैं।
अपने समकालीन समाज की प्रवृत्ति और जीवन को आधार बनाकर प्रेमचंद और फकीरमोहन ने शोषित, पीड़ित और प्रताड़ित व्यक्ति के दुख और दर्द एवं पूंजीपतियों के प्रति उनके आक्रोश का चित्रण अपनी कहानियों में किया है। शोषक समाज पर तीखा व्यंग्य कर उन्होंने संपूर्ण सामंती मूल्यों और ढाँचे की व्यर्थता को खोल कर रख दिया है। अपने समय के तमाम सामाजिक मूल्यों को उखाड़-पुघाड़ कर उनका सूक्ष्म विश्लेषण किया है। इसके पीछे इनका लक्ष्य है किसान-मजदूर-श्रमिक आदि साधारण वर्ग की जनता के प्रति सामाजिक संवेदना प्रकट करना। इसी कारण अपनी भाषा के कथा-साहित्य में दोनों सामाजिक संवेदना के संस्थापक के रूप में सामने आते हैं। यथार्थ से होते हुए आदर्श की खोज दोनों की कहानियों की प्रवृत्ति रही है। सामाजिक समता और मानवीय प्रेम इनके साहित्य के महान आदर्श हैं। सामाजिक शोषण से संबंधित प्रेमचंद की कहानी ‘सवा सेर गेहूं’, ‘गरीब की हाय’ आदि के समतुल्य फकीरमोहन की कहानी ‘अधर्म वित्त’, ‘रेवती’ आदि हैं। जहाँ एक ओर प्रेमचंद की ‘स्त्री और पुरुष’, ‘अग्नि समाधि’, ‘कायर’, ‘उद्धार’, ‘नरक का मार्ग’, ‘मृतक भोज’ आदि कहानियों में क्रमशः पर्दा प्रथा, बहुविवाह प्रथा, जातिभेद, दहेज प्रथा आदि के दुष्परिणामों, वैश्या-उद्धार एवं कर्मकांड आदि के पिछड़ेपन को दिखाया गया है, वहीं दूसरी ओर फकीरमोहन की ‘पाठोईबहू’, ‘बगला बगुली’, ‘मौना-मौनी’, ‘धुलिया बाबा’ और‘डाक मुंशी’ आदि कहानियों में आधुनिकता का आग्रह, प्रगतिशील चेतना की चाह, कुप्रथाओं का निवारण, दहेज प्रथा का विरोध, धार्मिक पाखंड की निंदा, आर्थिक शोषण के प्रतिरोध आदि सामाजिक दशाओं और दिशाओं का चित्रण देखने को मिलता है। दोनों कहानीकारों ने अपनी कहानियों में सामाजिक यथार्थ और सांस्कृतिक मूल्यों की सफल अभिव्यक्ति की है।
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Pages:43-47
How to cite this article:
मौसम तिवारी "प्रेमचंद और फकीरमोहन की कहानियों में सामाजिक यथार्थ और संवेदना". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 2, 2026, Pages 43-47
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