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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 3, ISSUE 2 (2021)
प्रदूषण और आदिवासी समुदाय (आदिवासी उपन्यासों के विशेष संदर्भ में)
Authors
डॉ. राठोड पुंडलिक
Abstract
भारत के आदिवासी मुख्यत: उन क्षेत्रों में निवास करते हैं जहाँ प्राकृतिक संसाधनों यथा धात्विक, अधात्विक खनिजों का भंडार एवं दोहन की व्यापक सम्भावनाएँ हैं। देश के सर्वांगिन विकास हेतु संसाधनों का दोहन आवश्यक है। इसलिए इन क्षेत्रों में व्यापक रूप से उत्खनन और अन्य गतिविधियाँ होती हैं किंतु प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित, असंधारणीय अत्यधिक दोहन के परिणाम्स्वरूप वन्य परितंत्रों का ह्रास, नदी, नालो तथा अन्य जल-स्त्रोतों की शुद्धता में कमी और पर्यावरण निम्नीकरण होता हैं क्योकि संसाधन दोहन प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों का उत्सरजन होता है। प्रदुषक सम्पूर्ण क्षेत्र को हर स्तर पर प्रदूषित करता है। परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदुषण, कृषि प्रदूषण होता है। दोहन प्रक्रिया के उप-उत्पादक अपशिष्ट प्रदूषक जब पूरे क्षेत्र को प्रदूषित करते हैं तब इस प्रदूषण का नकारत्मक प्रभाव उन क्षेत्रों में निवासित आदिवासी समुदायों, वन्य-प्राणियों तथा पेड-पौधों पर पड़ता है। प्रदूषण के इस नकारात्मक प्रभाव के कारण आदिवासी समाज विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं और असाध्य बीमारियों का शिकार हो रहा है।
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Pages:32-36
How to cite this article:
डॉ. राठोड पुंडलिक "प्रदूषण और आदिवासी समुदाय (आदिवासी उपन्यासों के विशेष संदर्भ में) ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 2, 2021, Pages 32-36

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